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जिला लखीमपुर खीरी

जिला लखीमपुर खीरी

भारत और नेपाल की तराई में बसा लखीमपुर खीरी जिला उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है। लखनऊ से लगभग 135 किलोमीटर सड़क मार्ग से दूरी पर बसा लखीमपुर खीरी जिला भारत- नेपाल अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसा हुआ है और साथ ही साथ सीतापुर बहराइच पीलीभीत शाहजहांपुर और हरदोई की सीमाओं से घिरा हुआ है।7680 वर्ग किलोमीटर एरिया में फैले लखीमपुर खीरी जिले में 23 पुलिस थाने 15 विकासखंड और 7 तहसीलें हैं। लखीमपुर खीरी जिला सरकारी अभिलेखों में खीरी के नाम से जाना जाता है। कालांतर में कभी लक्ष्मीपुर के नाम से जाना जाता था। लखीमपुर जिला मुख्यालय है सरकारी दफ्तर जिलाधिकारी कार्यालय पुलिस अधीक्षक कार्यालय सभी लखीमपुर में स्थित है। लखीमपुर से लगभग 6 किलोमीटर दूर एक कस्बा खीरी बसा हुआ है। इस जिले में पहली बार आने वाले लोग कई बार भ्रमित हो जाते हैं कि शायद खीरी ही जिले का मुख्यालय है। रेल मार्ग से लखनऊ से आने पर खीरी कस्बा पहले पडता है और लखीमपुर बाद में। सड़क मार्ग से आने पर लखनऊ से आते हुए खीरी कस्बा बीच में नहीं पड़ता। जिला खीरी पौराणिक महत्व का तो जिला है ही है साथ ही अपार वन संपदा समेटे हुए यह जिला इस समय प्रदेश का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान राष्ट्रीय पार्क जो कि अब टाइगर रिजर्व के रूप में बदल चुका है की भी संपत्ति समेटे हुए हैं। वन संपदा तथा वन्य जीव तथा इस जिले की माटी में लिपटा शांतिपूर्ण वातावरण इस जिले की खूबी को और भी बढ़ा देता है। शांतिप्रिय जिले के नाम से पहचाने जाने वाला लखीमपुर खीरी जिला आजादी की लड़ाई में भी विशेष योगदान देने वालों में रहा है। देश की आजादी के लिए मर मिटने वालों में राजनारायण मिश्रा का नाम उल्लेखनीय है ।इस जिले के गोला तहसील में बसे ग्राम भीखमपुर के निवासी राजनारायण मिश्रा की  गांव की खासियत यह है कि यह जिला आज़ादी की लड़ाई में जहां अंग्रेजो के आंखों की किरकिरी बना रहा वहीं आजादी के मतवालों की लड़ाई का मुख्य केंद्र भी बना रहा। महाभारत काल के पौराणिक स्थल इस जिले के मोहम्मदी तहसील क्षेत्र में हैं तो पौराणिक महत्व का देवकली तीर्थ जहां पर की जन्मेजय ने  सभी सर्पों  की आहुति दी थी भी लखीमपुर से चंद किलोमीटर की दूरी पर है। तंत्र विद्या के आधार पर बना ओयल राज्य द्वारा बनाया गया ओयल में मेंढक मंदिर भी न केवल कोतुहलता का विषय है बल्कि आज पर्यटन विभाग द्वारा इसको पर्यटन की श्रेणी में रखा गया है । इसी के साथ सिंगाही का महल भी पर्यटन विभाग द्वारा इसी श्रेणी में लिया गया है। अभी तक छोटी रेलवे लाइन के साधनों से भरा यह जिला शीघ्र ही बड़ी रेलवे लाइन के सपने को साकार कर लेगा। साथ ही सड़क मार्गों पर सीतापुर से लखीमपुर तक फोरलेन के तेजी से चल रहे कार्य से सड़क मार्ग की सुविधाएं भी पहले से काफी बेहतर हो जाएंगी। दुधवा टाइगर रिजर्व जाने वाले वन्यजीव प्रेमी और पर्यटक लखनऊ से सड़क मार्ग से जाने पर लखीमपुर होकर ही अपना रास्ता तय करते हैं।

दुधवा टाइगर रिजर्व
 उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल के जिला लखीमपुर खीरी जोकि अंतरराष्ट्रीय भारत नेपाल सीमा पर हिमालय की तराई में बसा हुआ है। प्रदेश का एकलौता दुधवा टाइगर रिजर्व एक विशेष आकर्षण व भ्रमण का स्थान है। लगभग 500 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले दुधवा टाइगर रिजर्व में पर्यटकों तथा शोधकर्ताओं के लिए यहां घूमने और देखने के लिए बहुत कुछ है। 1958 में यहाँ वन्यजीवों की बहुतायत संख्या को देखते हुए इस और सरकार का विशेष ध्यान गया। तब यह क्षेत्र उत्तर खीरी वन विभाग की सीमा में हुआ करता था। धीरे-धीरे इस क्षेत्र में वन्यजीवों की तरफ वन प्रेमियों का ध्यान बढ़ा सरकार ने भी इस ओर ध्यान दिया और इस क्षेत्र से जुड़े विल्ली अर्जुन सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से प्रयास कर इसको दुधवा नेशनल पार्क का दर्जा दिलवाया।तब उत्तर खीरी वन विभाग से दुधवा नेशनल पार्क अलग हो गया। उसके बाद वन विभाग और प्रदेश व देश की सरकार ने इस ओर विशेष ध्यान व विशेष योजनाएं यहां के लिए चलाई तथा यहां पर वन्यजीवों के संरक्षण तथा उनकी बढ़ोतरी के लिए प्रयास किए जाने लगे। इस क्षेत्र में निरंतर हुए प्रयासों का यह परिणाम रहा कि यहां पर बाघों की संख्या बढ़ी पूरा विश्व जिस समय बाघों की घटती संख्या से चिंतित था उस समय बाघों की यहां बढ़ती संख्या से सभी यहाँ के अनुकूल माहौल से आशावान हुए। उनके और संवर्धन के लिए इस दुधवा नेशनल पार्क को 1987 में दुधवा टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघ तेंदुआ हाथी हिरन बारहसिंघा भारी संख्या में उपलब्ध है। दुधवा टाइगर रिजर्व की सबसे खास बात यह है कि वन जीवो की बढ़ोतरी और संरक्षण के लिए सब कुछ यहां पर एक ही जगह पर उपलब्ध है। बारहसिंघा के लिए यहां पर उसके अनुकूल घास उपलब्ध है तो बाघों के संवर्धन और बाघों के संरक्षण और संवर्धन के लिए यहां पर उनका उनके उनका पसंदीदा भोज बारहसिंघा और हिरन भी उपलब्ध है। धीरे-धीरे पूरे विश्व और भारत में व प्रदेश के वन जीव प्रेमियों तथा पर्यटकों का ध्यान और रुचि जब इस तरफ बढ़ी तो यह क्षेत्र पर्यटन के रूप में भी निरंतर बढ़ने लगा। जब पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी तो वन विभाग में भी यहां पर उसी के अनुसार सुविधाएं बढ़ाने की शुरू की धीरे-धीरे टाइगर दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वास योजना का भी शुरुआत हुआ सोनारी के पास सलूका पुर गैंडा क्षेत्र विकसित किया गया जिसमें से शुरुआत में दुधवा टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटकों का आकर्षण यहां के वन्य जीव विभाग आदि के साथ-साथ गेंडा रेंज भी है। पर्यटकों के यहां रुकने के लिए दुधवा में थारू हट व  डोरमेट्री के अलावा सोनारी पुर सठियाना बनकटी में भी रेस्ट हाउस बने हुए हैं हालांकि केवल दुधवा में ही कैंटीन की व्यवस्था है, सोनारी पुर तथा सठियाना बनकटी या अन्य विश्राम ग्रह में रुकने वाले पर्यटकों को अपने खाने पीने की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है जब दुधवा टाइगर रिजर्व बना तो पड़ोसी जनपद बहराइच का कर्तनिया घाट का  क्षेत्र भी इसी का हिस्सा बन गया। किशनपुर बर्ड सेंचुरी भी दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है जो कि भीरा और मेलानी के मध्य है। दुधवा टाइगर रिजर्व में पहले दुधवा वन विभाग द्वारा ही पर्यटकों के लिए रुकने के आरक्षण की व्यवस्था की जाती थी लेकिन अब यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश वन निगम द्वारा ऑनलाइन उपलब्ध है जिसके कारण बाहर से आने वाले पर्यटकों को इससे काफी सुविधा हुई है। दुधवा टाइगर रिज़र्व आने वाले पर्यटकों को लखनऊ बरेली अथवा गोंडा से आने के लिए यहां सड़क व् रेल मार्ग उपलब्ध है। देश विदेश से आने वाले पर्यटकों को यहां आने के साधन के रूप में बस ट्रेन टैक्सी की सुविधा लेनी पड़ती है। हवाई मार्ग से आने वाले पर्यटकों को लखनऊ हवाई अड्डे से दुधवा पार्क तक का लगभग 215 किलोमीटर का मार्ग मुख्य रूप से सड़क से ही तय करना पड़ता है। लखनऊ से वाया सीतापुर- लखीमपुर - पलिया के द्वारा दुधवा पहुंचा जा सकता है। दुधवा पहुंचने वाले पर्यटकों को सूर्योदय  से सूर्यास्त के बीच में ही अपना पहुंचने की एंट्री करनी पड़ती है। सूर्यास्त के बाद दुधवा में प्रवेश का गेट बंद कर दिया जाता है। 15 नवंबर से 15 जून तक खुलने वाले दुधवा टाइगर रिजर्व को 16 जून से 14 नवंबर तक बरसात के कारण बंद कर दिया जाता है। इसी बीच यहां पर मेंटेनेंस का कार्य किया जाता है। दुधवा टाइगर रिजर्व में ठहरने वाले पर्यटकों को जंगल के अंदर  जाने के लिए अपने वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है। जंगल में घूमने जाने वाले पर्यटकों को वन विभाग के की जीप मिनी बस या हाथी के जरिए घूमने जाना पड़ता है। इस सब के साथ एक गाइड का होना आवश्यक है। जिसका कि सब व्यय पर्यटकों को ही करना पड़ता है।

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